Description
यह पुस्तक एक ऐसे रचनाकार की आत्मस्वीकृति और रचनात्मक यात्रा का दस्तावेज है जिसने जीवन के कठिन समय में शब्दों को अपना सहारा बनाया। लेखक स्वयं को नास्तिक कहता है, लेकिन उसके लिए कहानियाँ ही उसका विश्वास बन जाती हैं। जब जीवन की धूप तीखी हो जाती है, वह अपनी रचनाओं की छांव में लौट आता है और वहीं उसे ठहराव मिलता है।
यह संसार शायद कुछ लोगों को पलायन जैसा लगे, पर लेखक के लिए यह एक आकर्षक और जीवंत दुनिया है। इस दुनिया में उसे विजेता नहीं, बल्कि पराजित पात्र अधिक खींचते हैं। हार चुके लोगों के भीतर छिपे नाटकीय और भावनात्मक संसार को वह गहराई से देखता है। उसके लिए जीत की सीधी रेखाएं उतनी दिलचस्प नहीं जितनी हार की उलझी हुई कहानियां।
लेखन उसके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार है। हर रचना पूरी करने के बाद जो आंतरिक उल्लास और आत्मविश्वास उसकी चाल में उतर आता है, वही उसकी सृजन प्रक्रिया की सच्ची पहचान है।
प्रेम की बात करें तो लेखक स्वीकार करता है कि उसने प्रेम को जीवन में महसूस किया, पर उसे समझा अपने लेखन के माध्यम से। यह पुस्तक उसी समझ, उसी आत्ममंथन और उसी संवेदनशील दृष्टि का परिणाम है।
यह कृति उन पाठकों के लिए है जो आत्मविश्लेषण, संवेदना और रचनात्मक ईमानदारी को महत्व देते हैं। यह केवल कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि भीतर की दुनिया को देखने का आमंत्रण है।
लेखक, मानव कौल





Meenal Gupta –
Book slow pace mein chalti hai lekin har chapter ke baad sochne par majboor karti hai. Literary readers ke liye bahut achhi choice hai.
Rahul Sinha –
Manav Kaul ki writing bahut hi honest aur raw lagti hai. Hara hua insaan unke yahan hero ban jata hai. Book ne mujhe deeply touch kiya.